4

संघर्ष, सार्थक सोच और सफलता की बेमिसाल कहानी

by bjpmodiFebruary 10, 2020

सीतामढ़ी से शुरु हुई सुनहरे सपनों की जबर्दस्त उड़ान

आंधियों में कभी ना बुझने वाली लौ की कहानियाँ पिरोना बड़ा सहज लगता है लेकिन वो बड़े जिगर वाले होते हैं जो मुश्किलों और मुसीबत में मिली चुनौती को एक अलग मोड़ देते हैं और उसे एक नए मुकाम तक लेकर जाते हैं। उनके रास्ते के दु:ख और तकलीफ की दास्तान सुनने वाले को दर्द का एहसास तो होता है लेकिन फौलाद का सीना रखने वाले को असाध्य परिस्थितियों में भी कुछ असाधारण करने की धुन सवार रहती है और ऐसे ही धुन के पक्के छोटे-छोटे प्रयासों के बल पर ही एक बड़ी बुलंदी को छूते जाते हैं।

सोच और सपने ‘विशाल’ हों ये बड़ी बात तो है लेकिन उसके साथ आपका ‘विवेक’ हमेशा आपको बेहतर करने की प्रेरणा दे ये सोने पर सुहागा जैसा हो जाता है। बिहार के डुमरा, सीतामढ़ी जैसे छोटे शहर में पले-बढ़े विशाल विवेक सिंह की भी ऐसी ही कहानी है।


पुत के पांव को पालने में ही पहचानने का दावा करने वाले भी विशाल को नहीं जान सके थे कि स्वभाव से मधुर और सौम्य नजर आने वाले विवेक कैसे अपने रास्तों की रुकावट को एक अविस्मरणीय कहानी का हिस्सा बना देंगे। कैसे वो एक छोटे शहर से निकल कर एक अद्भुत उड़ान भरेंगे।

जिस उम्र में हमें अपने लक्ष्य का एहसास तक नहीं होता, हमें हमारे होने का आभास तक नहीं होता, उस उम्र में विवेक का सामना एक के बाद एक करके कई चुनौतियों से हुआ। विवेक की उम्र 13 साल की रही होगी, पिता अल्जाइमर नामक बीमारी से जूझ रहे थे। सरकारी नौकरी तो थी लेकिन सरकारी तंत्र इतना जर्र-जर्र था कि महीनों तक अपने वेतन के लिए उन्हें इंतजार करना पड़ता।

ईलाज का खर्च और 10 लोगों का परिवार, एक-एक दिन काटना मानों सदियों को पार करने जैसा था।

आठ भाई-बहनों में विवेक पाँचवें नंबर पर हैं। घर के मुश्किल हालात उन्हें परेशान करते कुछ गलत करने के लिए उकसाते इसकी बजाए वो छोटी उम्र से ही एक अलग लकीर खींचने की खोज में लग गए थे। अपनी मौजूदा कौशल और क्षमता के बल पर पिता और माँ की जिम्मेदारियाँ बांटने से लेकर वो astronomer बनने के अपने सपने को साकार करने की तरकीब सोचने लगे।

खाना कब मिला, कब नहीं मिला, सुकून भरी नींद आई या नहीं, पढ़ाई कैसी चल रही है या आगे कैसे चलेगी, इन सब बातों से खुद को तोड़ने की बजाय विशाल अपने पिता की जिम्मेदारियों को साझा करने के रास्ते पर कम उम्र में ही निकल पड़े।

इसी कड़ी में उनके जीवन की पहली मंजिल बनी ऐतिहासिक कोलकाता की धरती। लेकिन समस्याओं से थोड़ा मन टूटा तो रामकृष्ण मिशन के जरिए विशाल ने सन्यासी बनने की भी सोची। यह उथल-पुथल भी मन को खूब उद्वेलित करती रही। कभी बहनों की मुस्कान और उनका भोलापन तो कभी बीमार पिता की बेबसी और लाचार माँ की ममता, विशाल ने खुद को सन्यासी बनने से पहले ही सचेत कर दिया । कोलकाता के ट्यूशन की कमाई जब कम पड़ने लगी तो उन्होंने दिल्ली की उड़ान भरी। दिल्ली में ट्यूशन से मोटी कमाई का लालच विशाल को राजधानी खींच लाया लेकिन यहाँ आने के साथ ही घर के दबाव में कई पेशे में उन्होंने अपना हाथ आजमाया। फॉर्मल एजुकेशन से दूर रहने की टीस इतनी गहरी थी कि उसकी भरपाई के लिए विशाल ने किताबों को ही अपना दोस्त बना लिया। एक के बाद एक करके उन्होंने कई किताबें पढ़ी और इसी पढ़ाई से उनमें कब लिखने का शौक जागा उन्हें पता ही नहीं चला। दो महीने आईबीएम की नौकरी और फिर एक कन्टेंट राइटर के तौर पर जोर आजमाइश से होते हुए कब विशाल एक entrepreneur बने, कब उन्होंने अपना start-up शुरु किया, ये सब एक दिलचस्प मगर अनहोनी सी लगने वाली कहानी लगती है।

जिस दिन विशाल को अपना पहला क्लांइट मिला उसी दिन उनके पिता का देहांत हुआ। विशाल के लिए यह समझना मुश्किल था कि इस उम्र में ही एक start-up को खड़ा करने की ओर कदम रखने का जश्न मनाउं या पिता के निधन का शोक। युवा विशाल अपने माँ और बहनों की आखिरी उम्मीद बन चुके थे। पांच बहनों की पढ़ाई और उनके शादी की जिम्मेदारी विशाल को खुली चुनौती दे रही थी। माँ की सूनी मांग और बहनों का जीवन संवारने की चुनौती विशाल को भावुक कर रहे थे। लेकिन इसी बीच SEO Corporation ने जन्म ले लिया था।

विशाल के लिए यह एक परिवार का नया मेहमान था। विशाल उसकी ऊंगलियाँ पकड़ उसे रास्ते पर लाने लगे। क्लाइंट लाने से लेकर उनके काम को समय पर और उनकी माँग के मुताबिक पूरा करना विशाल का जुनून बनता गया। विशाल को भूख का एहसास तब होता, जब उन्हें कोई याद दिलाता। उन्हें नींद तब आती, जब नींद के बगैर उनके पाँव लड़खड़ाने लगते। उन दिनों के हालात को और विशाल के जज्बात का सही आकलन करना बेहद मुश्किल था। बिना किसी आर्थिक सहायता के और किसी सहयोग के कल के विशाल आज SEO Corporation के चेयरमैन के रुप में पहचाने जाने लगे। एक छोटे से टूटे-फूटे कमरे से विशाल ने जिस कंपनी की शुरुआत की उसकी दिवारें तो कमजोर थीं लेकिन विशाल के इरादे दिनोदिन मजबूत होते गए। एक व्यक्ति औऱ एक कमरे से जन्मा एक सपना आज कई घरों की उम्मीद बन चुका है। छोटे शहर से निकला एक डरा सहमा युवा आज दुनिया के हर कॉन्टिनेंट में अपने पांव पसार चुका है। और जिन बहनों की जिम्मेदारी को लेकर उनकी माँ अक्सरहां घबरा जाया करती थीं, आज उनमें से दो दिल्ली जैसे महानगर में खुद का बिजनेस चला रही हैं।

SEO Corporation को बड़े-से-बड़े मुकाम तक ले जाना और अपने जैसे कई और entrepreneur को खड़ा करने जैसा सपना अभी भले ही अधूरा हो लेकिन विशाल आज अपनी माँ के करीब-करीब सभी सपने को साकार कर चुके हैं।

SEO Corporation की जड़े मजबूत बनाकर विशाल उन इलाकों का रुख करने का मन बना चुके हैं जहाँ के लोग अपनी जड़ों से उखड़ते जा रहे हैं। जहाँ के लोग अपने जीवन की बुनियादी जरुरुतों को पूरा करने की लड़ाई भी नहीं लड़ पा रहे हैं। इसी सिलसिले में विशाल और उनकी टीम ने हेम्प फाउंडेशन की स्थापना की।

इस फाउंडेशन के जरिए विशाल और उनकी टीम उत्तराखंड के दूरदराज के ग्रामिण इलाकों में रहने वालों के जीवन में हरियाली लाने के रास्ते पर निकल चुके हैं। आकाश को छूते पर्वत और पाताल सी गहराई जैसी नजर आने वाले इस प्रदेश में हर तरह की खेती नहीं की जा सकती। लेकिन यहाँ भांग की खेती की अपार संभावने हैं। गांव के लोगों की टूटती उम्मीदों और उनकी खराब आर्थिक हालात को दूर करने के लिए हेम्प फाउंडेशन ने ना सिर्फ भांग की खेती करने के प्रति स्थानीय लोगों को जागरुक किया बल्कि उन्हें ऐसा करने की हरसंभव मदद भी की। भांग की फसल उगाने से लेकर उन्हें खरीदने तक का भरोसा लेकर हेम्प फाउंडेशन की टीम उत्तराखंड के गांवों में दिन-रात चौबीसो घंटे काम कर रही है।

टूटते सपने और मुरझाए चेहरे पर इस फाउंडेशन ने आशा और खुशी की नई लकीर खींच दी है। इसके विज़न और मिशन में वो भरोसा है जो उत्तराखंड में एक नई आर्थिक क्रांति ला सकता है। विशाल की टीम इस सोच से काम कर रही है जिसमें आने वाले भविष्य को यह धरती और हरी भरी और उपजाऊ नज़र आए। विशाल इसी मुहिम के बहाने प्रकृति को बचाए रखने के रास्ते पर भी निकल चुके हैं जिसको लेकर पूरी दुनिया में बहस तो हो रही है लेकिन जरूरी सार्थक प्रयास नहीं।

उत्तराखंड के गांवों में मिट्टी से सने पैरों और किसानों सी छवि लिए विशाल एक ऐसे उद्यमी/व्यवसायी की परिभाषा भी लिख रहें हैं जो यकीन करता है कि पूरे देश में बदलाव की बयार गांव से होकर ही गुज़रती है। गांव में रहने वाली मां और बहनें मजबूत होंगी तब ही हमारी बाज़ू मजूबत नज़र आएगी।

यह सब होता देखकर विशाल की माँ अपने लाड़ले की हिम्म्त और दिलेरी का बड़ा गुमान करती हैं। विशाल के वीरता की कहानी भी सुनाती हैं। लेकिन बोलते-बोलते वो भावुक हो जाती हैं। उन्हें लगता है विशाल जिम्मेदारियों से दबा है। लेकिन भोली माँ ये नहीं जानती कि उनके हुनरमंद बेटे का एक अलग ही दबदबा है|

युवा अवस्था में ही विशाल उन कामयाब लोगों की फेहरिस्त में अब शामिल हो चुके हैं जो अगली पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं। देश का नामचीन अखबार Times of India ने हाल ही में ‘I did it!, Exceptional Stories of People who made it large’ नामक किताब में विशाल के जबर्दस्त और अविस्मरणीय सफर की दास्तान छापी। और ना जाने उनके दमखम की कहानी और कितने पन्नों में भविष्य में भी छापी जाएंगीं।

About The Author
bjpmodi

Leave a Response